दुकानें जलती रहीं, अफसरों की फाइल नहीं चली:MP में फायर सेफ्टी कानून लागू होने में देरी; न जुर्माना लग रहा, न कार्रवाई

मध्य प्रदेश में फायर सेफ्टी के लिए नया कानून तो बन गया, लेकिन अफसरों की लापरवाही के कारण यह जमीन पर उतरने से पहले ही बेअसर साबित हो रहा है। राज्य सरकार ने ‘मध्य प्रदेश अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवाएं अधिनियम, 2026’ का गजट नोटिफिकेशन 3 सितंबर को जारी किया था।

एक महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी संबंधित विभाग इसके नियमों को आखिरी रूप नहीं दे सका है। भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि नियमों की फाइल मंत्रालय और नगरीय प्रशासन विभाग के बीच लंबित है।

इसके कारण प्रदेशभर में दमकल विभाग न तो व्यावसायिक परिसरों की अनिवार्य चेकिंग कर पा रहा है और न ही नियम तोड़ने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई कर पा रहा है। 

10 मिनट में दमकल पहुंचने का दावा, न्यू मार्केट में आधे घंटे से ज्यादा की देरी

नए एक्ट का सबसे बड़ा दावा यह था कि आपात स्थिति में सूचना मिलते ही दमकल का रिस्पॉन्स टाइम अधिकतम 10 मिनट होगा। लेकिन 8 अक्टूबर को भोपाल के व्यस्त न्यू मार्केट में जब छोले-भटूरे की दुकान में आग लगी, तो दमकल को मौके पर पहुंचने में आधे घंटे से ज्यादा का वक्त लग गया।

अतिक्रमण और संकरे रास्तों के कारण दमकल गाड़ियां फंस गईं। आग फैलती गई और देखते ही देखते 5-6 दुकानें जलकर खाक हो गईं, जिससे 3 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ।

अगर एक्ट के तहत नियम लागू होते, तो इस चार मंजिला व्यावसायिक इमारत का स्वीकृत ‘फायर सेफ्टी प्लान’ और आपातकालीन निकास मार्ग होना कानूनी रूप से अनिवार्य होता।

3 सितंबर के बाद आग की 7 घटनाएं: सुरक्षा नियमों से कैसे घट सकता था नुकसान?

दैनिक भास्कर ने 3 सितंबर के बाद प्रदेश के अलग-अलग शहरों में हुई आग की 7 बड़ी घटनाओं की पड़ताल की और विशेषज्ञों से समझा कि यदि नियम लागू होते तो नुकसान कितना कम हो सकता था।

1. भोपाल (8 अक्टूबर):न्यू मार्केट में 3 करोड़ का नुकसान

  • घटना: छोले-भटूरे की दुकान से भड़की आग ने 5-6 दुकानों को चपेट में लिया। 20 दमकलों को आग बुझाने में 2 घंटे लगे।
  • नियम होते तो क्या बदलता: कमर्शियल कॉम्प्लेक्स की नियमित फायर ऑडिट, गैस व ज्वलनशील पदार्थों के सुरक्षित रख-रखाव और रास्तों पर निगरानी से नुकसान काफी हद तक रुक सकता था।

2. उज्जैन-इंदौर मार्ग (6 अक्टूबर):चलती पैसेंजर बस जलकर खाक

  • घटना: ‘मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा’ की बस का पिछला टायर फटने के बाद आग लग गई। गनीमत रही कि चालक-परिचालक समेत 25 से अधिक यात्री सुरक्षित बाहर निकल आए।
  • नियम होते तो क्या बदलता: बस में अग्निशमन उपकरणों की मौजूदगी और स्टाफ का प्रशिक्षण नुकसान घटाता। हालांकि, टायर फटने जैसी तकनीकी खराबी रोकने के लिए वाहन फिटनेस और मोटर व्हीकल नियमों का कड़ा पालन भी जरूरी है।
  • 3. उज्जैन (3 अक्टूबर):सिलेंडर लीकेज से धमाका, युवक 70% झुलसा

    • घटना: तिरुपति धाम कॉलोनी में किराए के कमरे में एलपीजी लीकेज के बाद आग लगी। 24 वर्षीय युवक 70% झुलस गया और दीवार ढह गई।
    • नियम होते तो क्या बदलता: आवासीय/किराए के परिसरों में बुनियादी सुरक्षा तैयारी मदद करती, हालांकि घरेलू एलपीजी सुरक्षा मानकों का पालन नागरिक स्तर पर भी उतना ही आवश्यक है।

    4. उज्जैन (23 सितंबर): गणेश पंडाल में अग्निकांड

    • घटना: नीलगंगा क्षेत्र की संतराम सिंधी कॉलोनी में वैष्णोदेवी थीम वाले पंडाल में शॉर्ट सर्किट से आग लगी। 11 फीट की गणेश प्रतिमा और सजावटी सामान जल गया।
    • नियम होते तो क्या बदलता: अस्थाई पंडालों के लिए सुरक्षा शर्तों की जांच और बिजली कनेक्शन का पूर्व-सत्यापन आग के फैलाव को रोक सकता था।
    • 5. दमोह (19 सितंबर): होटल की रसोई में आग, 2 कर्मचारियों की मौत

      • घटना: होटल ‘रॉयल दमयंती पैलेस’ में सगाई समारोह के दौरान गैस पाइपलाइन में खराबी से आग फैली। कैटरिंग के 2 कर्मचारियों की मौत हो गई और 2 गंभीर रूप से झुलस गए।
      • नियम होते तो क्या बदलता: होटल रसोई की अनिवार्य गैस सुरक्षा जांच, ऑटोमैटिक फायर अलार्म, अग्निशमन उपकरण और कर्मचारियों की ट्रेनिंग से शुरुआती दौर में ही आग पर काबू पाया जा सकता था।

      6. सतना (18 सितंबर):बहुमंजिला इमारत की चौथी मंजिल पर आग

      • घटना: कामता टोला में एक बहुमंजिला मकान की चौथी मंजिल में शॉर्ट सर्किट/एसी कंप्रेसर से आग लगी। 18 दमकलों ने 2 बच्चियों समेत 4 लोगों को सुरक्षित निकाला।
      • नियम होते तो क्या बदलता: भवन की ऊंचाई के हिसाब से फायर प्लान, इमरजेंसी सीढ़ियों और अलार्म सिस्टम की पहले से चेकिंग होती तो रेस्क्यू और तेजी से होता। शॉर्ट सर्किट रोकने के लिए इलेक्ट्रिकल ऑडिट भी जरूरी होता।

      7. ग्वालियर (9 सितंबर): पेट्रोल पंप पर बाइक में आग

      • घटना: शिंदे की छावनी स्थित इंडियन ऑयल पेट्रोल पंप पर पेट्रोल भरवाते समय बाइक में आग लग गई, जिसमें एक युवक झुलस गया।
      • नियम होते तो क्या बदलता: पेट्रोल पंप परिसरों में इमरजेंसी शट-ऑफ स्विच, अग्निशमन उपकरणों की चालू स्थिति और कर्मचारियों की त्वरित तैयारी से हादसा बड़ा रूप नहीं ले पाता।
      • नियम बनाने में देरी क्यों?

        मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, विधानसभा से विधेयक पारित होने के बाद उसे राज्यपाल की मंजूरी मिलने में करीब एक महीने लगा। 3 सितंबर को अधिनियम का गजट नोटिफिकेशन जारी हुआ।

        इसके बाद नियमों के मसौदे पर विभागों के बीच सहमति नहीं बन सकी और फाइल मंत्रालय तथा नगरीय प्रशासन विभाग के बीच लंबित है।

      • नियम नहीं बने, तो किन कामों पर असर पड़ा?

        कानूनी विशेषज्ञों और प्रशासनिक जानकारों के मुताबिक, नए एक्ट में अधिकारियों को कुछ अधिकार दिए गए हैं, लेकिन उनके इस्तेमाल की प्रक्रिया नियमों पर निर्भर हो सकती है। नियम अधिसूचित नहीं होने से 5 प्रमुख काम प्रभावित हुए हैं।

        1. फायर NOC की नई प्रक्रिया ठप: नए भवनों और व्यावसायिक परिसरों के लिए पात्रता, शुल्क और NOC जारी करने की नई शर्तें स्पष्ट नहीं हैं।
        2. निरीक्षण पर संशय: मौके पर जाकर जांच कौन सा अधिकारी करेगा, जांच का प्रारूप क्या होगा और कमियां मिलने पर क्या नोटिस दिया जाएगा, इसका प्रारूप तय नहीं है।
        3. खतरनाक इमारतों को सील करने में कानूनी अड़चन: एक्ट की धारा 14 में असुरक्षित इमारतों को सील करने का अधिकार है, लेकिन यह प्रक्रिया नियमों पर निर्भर होने से अफसर सीधी कार्रवाई करने से डर रहे हैं।
        4. पंडाल व हाट-बाजार की सुरक्षा बेपटरी: धारा 11 के तहत भीड़भाड़ वाले अस्थायी आयोजनों और मेलों के लिए सावधानियों की आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं हो सकी है।
        5. जुर्माना और दंडात्मक कार्रवाई अधर में: नियम अधिसूचित हुए बिना उल्लंघनकर्ताओं या लापरवाह अधिकारियों पर जुर्माना लगाने की कानूनी प्रक्रिया अदालती विवादों में फंस सकती है।
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