दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को ‘ मिर्जापुर: द मूवी ‘ के मेकर्स से फिल्म के एक अहम सीन में ‘शूरवीर’ गाने के इस्तेमाल पर सवाल उठाए। यह गाना असल में महाराणा प्रताप को सम्मान देने के लिए बनाया गया था। कोर्ट ने मेकर्स के वकील से कहा कि वे अगले दिन आने से पहले फिल्म देख लें और यह बताएं कि क्या वे गाने के इस्तेमाल के तरीके से संतुष्ट हैं।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच ने एक्सेल एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड (फिल्म का प्रोडक्शन हाउस) की ओर से पेश वकील जय के. भारद्वाज से कहा, ‘आप कृपया इसे देखें और कल आएं। अगर आपका जमीर संतुष्ट हो… आप महाराणा प्रताप को दिखाते हुए बैकग्राउंड में ऐसा गाना बजा रहे हैं।’ यह कमेंट एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें मांग की गई थी कि फिल्म के क्लाइमेक्स से ‘शूरवीर’ गाने को हटा दिया जाए या उसकी जगह कोई दूसरा बैकग्राउंड गाना लगाया जाए।
‘शूरवीर’ को लेकर विवाद क्यों शुरू हुआ?
याचिका में अधिकारियों से उन नियमों के बारे में गाइडलाइंस मांगी गई हैं जो ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण हस्तियों से जुड़े गानों और क्रिएटिव कामों के इस्तेमाल को कंट्रोल करते हैं। याचिका में तर्क दिया गया है कि ऐसा कंटेंट उस हस्ती से जुड़ी वैल्यूज़ और विरासत के खिलाफ नहीं होना चाहिए।
महाराणा प्रताप को श्रद्धांजलि के तौर पर बना गाना
बहस के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि रैपेरिया बालम का गाया गाना ‘शूरवीर’ जुलाई 2020 में खास तौर पर महाराणा प्रताप को श्रद्धांजलि के तौर पर रिलीज़ किया गया था। इसके बोल में मेवाड़, चेतक, सम्मान और बलिदान का ज़िक्र है। खास बात यह है कि गाने की शुरुआत इस लाइन से होती है, ‘यह कोई गैंगस्टर गाना नहीं है।’
क्रिमिनल अंडरवर्ल्ड के पीछे क्यों है गाना?
उदयपुर में महाराणा प्रताप यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी के पूर्व छात्र, याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि यह गाना एक ऐसी फ़िल्म में दिखाया गया है जो क्रिमिनल अंडरवर्ल्ड पर आधारित है, जिसमें गैंग हिंसा, ड्रग्स, गैर-कानूनी हथियार, यौन शोषण और इलाके के लिए झगड़े जैसे मामले शामिल हैं।
कोर्ट ने कहा- फैसला केंद्र सरकार का
कोर्ट ने कलात्मक आजादी पर विचार किया। मामले की सुनवाई के दौरान बेंच ने क्रिएटिव आजादी के बड़े मुद्दे पर भी बात की। कोर्ट ने कहा, ‘हम सिर्फ एक कलाकार के मौलिक अधिकार की सुरक्षा पर ध्यान दे रहे हैं। यह कलाकृति है या नहीं, यह फैसला केंद्र सरकार को करना है। हम इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं। हम बस इतना कह रहे हैं कि शायद हम ऐसे मुद्दों पर फ़ैसला करने के लिए सक्षम नहीं हैं।’
वकील ने नहीं देखी है फिल्म
याचिकाकर्ता के वकील ने अंतरिम राहत की मांग करते हुए सुझाव दिया कि इस बीच बैकग्राउंड स्कोर को म्यूट कर दिया जाए या कुछ खास शब्दों को हटा दिया जाए। वकील ने माना कि उन्होंने फ़िल्म नहीं देखी है। जब कोर्ट ने भारद्वाज से उनका जवाब मांगा, तो सीधे पूछा, ‘क्या आपने फिल्म देखी है?’ भारद्वाज ने माना कि उन्होंने खुद फ़िल्म नहीं देखी है, लेकिन बताया कि उन्हें पता चला है कि वह सीन वैसा नहीं है जैसा कोर्ट में बताया जा रहा था। इस बातचीत के बाद, बेंच ने उन्हें फिल्म देखने और गुरुवार को अपना जवाब लेकर आने का निर्देश दिया। मामले की सुनवाई अगली तारीख तक के लिए टाल दी गई है।