भोपाल, मप्र में राज्य पुलिस सेवा (एसपीएस) के अधिकारियों के लिए पदोन्नति एक सपना बन गई है। यहां 1997 बैच के अधिकारी अब भी आईपीएस बनने की कतार में खड़े हैं, जबकि छत्तीसगढ़ में 2002 बैच के और कर्नाटक में 2012 बैच के अफसर आईपीएस प्रमोट हो चुके हैं।
नियमानुसार डीएसपी के रूप में 8 वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद अधिकारी आईपीएस संवर्ग में पदोन्नति के पात्र हो जाते हैं। लेकिन, वहीं मप्र में 28 साल की नौकरी के बाद भी ‘सितारे’ नहीं बदल रहे हैं। 500 से ज्यादा डीएसपी पात्रता रखने के बावजूद आईपीएस प्रमोट नहीं हो पा रहे।
आईपीएस प्रमोशन कोटे के कई पद रिक्त होने के बाद भी वर्ष 2023 में 4, 2024 में 5 और 2025 में मात्र 7 पद उपलब्ध हुए। दूसरी ओर राज्य प्रशासनिक सेवा के 2008 बैच के अधिकारियों को आईएएस अवार्ड हो चुका है।
भास्कर खास : प्रमोशन में देरी से तीन बड़े नुकसान
1. अधिकारियों में कुंठा : समान बैच के आईएएस काफी आगे निकल गए, जिससे पुलिस अधिकारियों के मनोबल पर असर पड़ रहा है। 2. अनुभव का नुकसान : वरिष्ठ अधिकारियों के पास फील्ड का गहरा अनुभव होता है, लेकिन समय पर आईपीएस न बनने से वे ‘डिसीजन मेकिंग’ का हिस्सा नहीं बन पाते। 3. निराशाजनक रिटायरमेंट : अधिकतर अफसर एएसपी या एसपी के पद से ही रिटायर हो जाएंगे, जो कैडर मैनेजमेंट की बड़ी विफलता है।
कैडर रिव्यू न होना देरी की बड़ी वजह प्रदेश में एसपीएस से आईपीएस की कैडर स्ट्रैंथ 97 है जो कुल डीएसपी की कैडर स्ट्रैंथ (1269) की तुलना में बहुत कम हैं। वहीं एसएएस से आईएएस अफसरों की कैडर स्ट्रैंथ 151 है जो कुल एसएएस अफसरों की कैडर स्ट्रेंथ (873) की तुलना मैं समानुपातिक है। हर 5 साल में कैडर रिव्यू होना चाहिए, जो कि 23 वर्ष मैं 3 बार हुआ है।’