नई दिल्ली/इस्लामाबाद: पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने ‘सिंधु जल संधि’ को सस्पेंड कर रखा है। भारत ने साफ कर दिया है कि ‘पानी और खून साथ साथ नहीं बह सकते’ जबकि पाकिस्तान अड़ियल रवैया अपनाए हुआ है। हालांकि जियो पॉलिटिक्स के इतर एक और बड़ा खतरा है जो इस 64 साल पुराने समझौते को बेमानी बना रहा है और वह है क्लाइमेट चेंज। इंडियन सोसाइटी ऑफ इंटरनेशनल लॉ के इंटरनेशनल इनवायरोमेंटल लॉ में में एसोसिएट प्रोफेसर अनवर सदात ने ‘द हिंदू’ में लिखा है कि अब समय आ गया है जब इस समझौते को सिर्फ ‘पानी के बंटवारे’ की नजर से देखने के बजाय एक ‘साझा प्रबंधन’ के रूप में देखा जाए।
उन्होंने लिखा है साझा जल संसाधनों के लिए ‘न्यायसंगत और उचित उपयोग’ (ERU) को एक बाध्यकारी सिद्धांत के रूप में अपनाने की वकालत की कमी है जबकि इसमें सिर्फ ‘नदी तक सबसे पहले कौन पहुंचा’ से परे सभी संबंधित परिस्थितियों को ध्यान में रखने का लचीलापन और क्षमता है। अनवर सदात के मुताबिक जलवायु परिवर्तन पानी की गुणवत्ता और मात्रा को प्रभावित करता है जो ऊपरी तटवर्ती देशों जैसे भारत के लिए भी जल संसाधनों के लाभकारी उपयोग की चुनौती पेश करता है।
क्यों आउटडेटेड हो गया है सिंधु जल समझौता?
अनवर सदात ने लिखा है कि सिंधु जल संधि मूल रूप से 1950 के दशक के हाइड्रोलॉजिकल डेटा पर आधारित है। उस समय जलवायु परिवर्तन जैसा कोई बड़ा खतरा नहीं था। लेकिन वर्तमान में यह समझौता पानी को दो हिस्सों में बांटने का काम करता है जो आज के समय में अव्यावहारिक होता जा रहा है।
उन्होंने लिखा है कि पाकिस्तान की पश्चिमी नदियों से भरोसेमंद पानी की सप्लाई पाने की जरूरत क्योंकि वह खेती पर बहुत ज़्यादा निर्भर है और उसे भयंकर बाढ़ का भी सामना करना पड़ता है और भारत की जलविद्युत प्रोजेक्ट्स विकसित करने और कश्मीर और उसके बाहर भी में पानी की जरूरतें पूरी करने की इच्छा है जहां से ज्यादातर नदियां निकलती हैं।
असंतुलित बंटवारा- यह समझौता पानी को बांटता जरूर है लेकिन यह ‘न्यायसंगत और उचित उपयोग’ (ERU) के सिद्धांत पर खरा नहीं उतरता।
दोनों देशों की अलग जरूरतें- भारत को कश्मीर और अन्य हिस्सों में पनबिजली और पानी की जरूरतें पूरी करनी हैं, जबकि पाकिस्तान पूरी तरह से कृषि और बाढ़ नियंत्रण के लिए इन पश्चिमी नदियों पर निर्भर है।
दुनिया के इन 3 बड़े समझौतों से क्या सीख सकते हैं भारत-पाकिस्तान?
अनवर सदात के मुताबिक सिंधु बेसिन के भविष्य को तय करने के लिए US-कनाडा जल संधि, 1961 जैसे उदाहरणों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इस संधि के तहत दोनों देश बहाव की दिशा में मिलने वाले फ़ायदों को बराबर-बराबर बांटते हैं।