नई दिल्ली: आपको उस दौर के बारे में याद होगा, जब भारत में कोयला से ट्रेन चला करती थीं। अब शायद की किसी ट्रेन को चलाने में कोयला का इस्तेमाल होता हो। डीजल से चलने वाली ट्रेन भी अब इक्का-दुक्का रह गई हैं। पूरे देश में अब ट्रेन बिजली से ही चलती हैं। वहीं अब सरकार वैकल्पिक ईंधन से चलने वाली ट्रेनों के विस्तार पर लगी है। हाल में हरियाणा में हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन शुरू हुई है। हाइड्रोजन के बाद अब गुजरात में एलएनजी से चलने वाली ट्रेन की भी शुरुआत हो चुकी है।
भारतीय रेलवे ने 27 सितंबर 2026 को गुजरात के साबरमती से देश की पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल DEMU ट्रेन शुरू की है। इससे पहले जुलाई में देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन शुरू किया गया था। दोनों ट्रेनें डीजल पर निर्भरता घटाने की दिशा में अहम प्रयोग हैं, लेकिन इनकी तकनीक, ईंधन इस्तेमाल और उत्सर्जन में बड़ा अंतर है।
LNG ट्रेन कैसे काम करती है?
नई एलएनजी ट्रेन पूरी तरह एलएनजी पर निर्भर नहीं है। इसमें डुअल-फ्यूल सिस्टम लगाया गया है, जिसके तहत इंजन एलएनजी और डीजल दोनों से चल सकता है। जरूरत और ईंधन की उपलब्धता के हिसाब से ट्रेन दोनों ईंधनों के बीच स्विच कर सकती है।
इस परियोजना के लिए साबरमती इंटीग्रेटेड कोचिंग डिपो में 1,400 HP क्षमता वाले दो ड्राइविंग पावर कार्स (DPCs) को कन्वर्ट किया गया है। सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि डीजल की खपत का करीब 40% हिस्सा एलएनजी से बदला जा सके। इससे ईंधन खर्च के साथ-साथ उत्सर्जन कम करने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
LNG ट्रेन में कितना ईंधन आता है?
- हर DPC में करीब 2200 लीटर क्षमता का एलएनजी टैंक लगाया गया है।
- इसमें लगभग 950 से 1000 किलोग्राम उपयोग योग्य एलएनजी रखा जा सकता है।
- एक डीपीसी फुल एलएनजी लोड पर करीब 444 किलोमीटर तक चल सकती है।
- एलएनजी के साथ डीजल का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार जारी रहता है, जिससे ट्रेन के पावर और ऑपरेशनल रिलायबिलिटी को बनाए रखने में मदद मिलती है।
लाखों रुपये की बचत का अनुमान
एलएनजी तकनीक से रेलवे को ईंधन लागत में भी बचत की उम्मीद है। ट्रायल आधारित अनुमान के अनुसार, एक डीपीसी से सालाना करीब 11.9 लाख रुपये की बचत हो सकती है। वहीं, 8 कोच वाली पूरी रेक के लिए यह बचत करीब 24 लाख रुपये सालाना आंकी गई है। इसके अलावा LNG के इस्तेमाल से CO2, नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और पार्टिकुलेट मैटर जैसे प्रदूषकों में कमी लाने का लक्ष्य है।
कैसी है हाइड्रोजन ट्रेन?
एलएनजी ट्रेन से पहले भारतीय रेलवे ने 17 जुलाई 2026 को जिंद-सोनीपत रूट पर देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन शुरू की थी। रेलवे मंत्रालय के अनुसार, 25 जुलाई तक यह ट्रेन 1,200 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय कर चुकी थी और इस दौरान 3,200 लीटर से अधिक डीजल की बचत हुई थी।
हाइड्रोजन ट्रेन में फ्यूल सेल तकनीक का इस्तेमाल होता है। इसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से बिजली पैदा होती है और इसी बिजली से ट्रेन की मोटर चलती है। इस प्रक्रिया का प्रत्यक्ष उप-उत्पाद पानी की भाप है। इस ट्रेन में दो हाइड्रोजन डीपीसी और कुल 2400 kW पावर आउटपुट है।
दोनों ट्रेनों में बड़ा अंतर
एलएनजी ट्रेन मौजूदा डीजल इंजन तकनीक को बदलने के बजाय उसमें एलएनजी को शामिल करके डीजल की खपत घटाती है। दूसरी ओर, हाइड्रोजन ट्रेन फ्यूल सेल के जरिए हाइड्रोजन से बिजली बनाकर ट्रेन को चलाती है। यानी एलएनजी मॉडल डुअल-फ्यूल ट्रांजिशन टेक्नोलॉजी है, जबकि हाइड्रोजन ट्रेन फ्यूल-सेल आधारित इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन की दिशा में कदम है।