भारत की भी जरूरत नहीं पूरी कर पाएगा वेनेजुएला का तेल, दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा को कैसे खतरे में डाल रहे ट्रंप, समझें

वॉशिंगटन: इटली के इतिहासकार Antonio Gramsci ने कहा था, ‘पुरानी दुनिया मर रही है और नई दुनिया जन्म लेने के लिए संघर्षरत है।’ मौजूदा समय कुछ ऐसा ही दिख रहा है। वेनेजुएला के बहाने ट्रंप का यह कहना कि जो जीतता है, लूट उसी की होती है और 18 सितंबर को रूस-ईरान पर नए प्रतिबंध कानून से तीसरे देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का रास्ता खुलना, नियम आधारित व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। ऐसे में ट्रंप की वेनेजुएला डील साहसिक है या संदिग्ध, और भारत पर इसका क्या असर होगा इस पर विमर्श जरूरी है।

महंगाई का खतरा

डोनाल्ड ट्रंप भले यह चाह रहे हों भारत और चीन जैसे देश रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदे, लेकिन उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि वैश्विक कच्चे तेल उत्पादन में रूस की 11-12% हिस्सेदारी है। इसमें बाधा पड़ने पर दूसरे तेल उत्पादक देशों के लिए भरपाई करना मुश्किल हो जाएगा। खासकर, जब पश्चिम एशिया में संघर्ष की वजह से खाड़ी देशों में तेल उत्पादन और आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा है। रूसी तेल की सप्लाई बंद होने से जो महंगाई बढ़ेगी, उससे न अमेरिका बचेगा और न यूरोप।

वेनेजुएला का तेल काफी नहीं

ट्रंप अब वेनेजुएला का कच्चा तेल बेचना चाह रहे हैं। लेकिन, रूस जहां रोजाना 1 करोड़ बैरल (bpd) तेल का उत्पादन करता है, वहीं वेनेजुएला की क्षमता सिर्फ 13 लाख bpd है। रोजाना करीब 50 लाख बैरल तेल की खपत करने वाले भारत के लिए वेनेजुएला आपूर्ति ही नहीं कर पाएगा। रूस से भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 40% से अधिक हिस्सा आयात करता है, जो जुलाई में रेकॉर्ड 28 लाख bpd तक पहुंच गया था। हालांकि, भारत ने पिछले महीने वेनेजुएला से भी लगभग 4.44 लाख bpd कच्चा तेल आयात किया था।

समृद्धि का आधार

वेनेजुएला की समृद्धि का आधार कभी तेल था। 1998 के बाद ह्यूगो शावेज के नेतृत्व में वामपंथी शासन ने तेल से होने वाली आय गरीबों तक पहुंचाने का वादा किया। लेकिन, संसाधनों के समान वितरण की जगह सरकारी तंत्र का विस्तार हुआ। प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ी, भ्रष्टाचार बढ़ा और अर्थव्यवस्था जर्जर हुई। राष्ट्र की संपत्ति पर हर नागरिक का अधिकार जरूरी है, लेकिन जरूरत से ज्यादा सरकारी नियंत्रण समाधान नहीं।

सबसे बड़ी डील

खैर, ट्रंप के लिए यह विश्व इतिहास की सबसे बड़ी ऑयल डील है और डेल्सी रोड्रिग्ज के लिए ट्रंप वेनेजुएला के नए भाग्य विधाता। उन्हें लगता है कि ईरान में अपने चूक की भरपाई वह वेनेजुएला से कर लेंगे। रोड्रिग्ज ने नॉर्थ अमेरिकन ब्लू एनर्जी पार्टनर्स (NABEP) को 17 तेल क्षेत्रों में रियायतें दी हैं, जहां करीब 65 अरब बैरल तेल है। बदले में अमेरिका को कंपनी में 35% हिस्सेदारी और उत्पादन पर अधिकार मिला है। डील के तहत 100 वर्षों तक अमेरिका को तेल खरीदने का पहला अधिकार होगा।

खतरे की घंटी

यही ट्रंपियन कैलकुलस है, लेकिन परदा हटाकर इसके पीछे का सीन देखिए। यही NABEP ह्यूगो शावेज के समय हर पाप में भागीदार रही है। वेनेजुएला के लोग इसे कितना स्वीकारेंगे और भविष्य की लोकतांत्रिक सरकार इसे कितना मानेगी, यह सवाल है। दूसरी बात, लॉन्ग टर्म कैपिटल इन्वेस्टमेंट के लिए अभी कोई आगे नहीं आ रहा और अमेरिका अपना पैसा लगाएगा नहीं। यही वजह है कि डील के साथ खतरा भी है।

विरोध में जनता

ऐसा इसलिए क्योंकि डील के लिए NABEP प्रमुख अलेजांद्रो बेटनकोर्ट को चुना गया है, जो यूरोप में मनी लॉन्ड्रिंग की जांच झेल चुके हैं। वेनेजुएला के लोग इसे अवैध सरकार के साथ हुई डील मानते हैं। ट्रंप का यह कहना कि वह पूरा तेल कब्जा लेंगे, लोगों को कैसे गंवारा होगा?

उम्मीद बाकी

फिलहाल, वेनेजुएला की तेल संपदा साम्राज्यवाद के कब्जे में है, जनता ठगी का शिकार है, लोकतंत्र संभावनाएं तलाश रहा है और देश का भविष्य अंधेरे में है। पूरा खेल कब्जे और मुनाफे का है। हालांकि, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो कहते हैं कि अमेरिका के हित में भी लोकतांत्रिक वेनेजुएला है। इसलिए उम्मीद बाकी है, लेकिन कराकस की सड़कों की आवाज कुछ और है। वेनेजुएला को लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार चाहिए। लेकिन, ट्रंप के कान में अलेजांद्रो बेटनकोर्ट कह रहे हैं कि चुनाव बिल्कुल नहीं। ट्रंपियन लूट के लिए भी यही अनुकूल है।

Spread the love