भोपाल। मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच और अभियोजन की गुणवत्ता एक बार फिर सवालों के घेरे में है। लोकायुक्त संगठन के आंकड़ों के अनुसार, आय से अधिक संपत्ति, रिश्वतखोरी और पद के दुरुपयोग जैसे मामलों में बड़ी संख्या में आरोपित अदालतों से बरी हो रहे हैं।
मई 2026 तक जिन मामलों का न्यायालयों में फैसला आया, उनमें करीब 43 प्रतिशत आरोपित दोषमुक्त हो गए। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर विवेचना और साक्ष्यों के प्रभावी प्रस्तुतीकरण में कमी इसके प्रमुख कारण हैं। हालांकि, पिछले एक दशक में कई वर्षों के दौरान दोषसिद्धि दर में उल्लेखनीय सुधार भी दर्ज किया गया है।
43 प्रतिशत आरोपित बरी, 2,917 को मिली सजा
लोकायुक्त संगठन के अनुसार मई 2026 तक दर्ज 5,090 मामलों में न्यायालयों का निर्णय आ चुका है। इनमें 2,917 आरोपितों को सजा सुनाई गई, जबकि 2,173 आरोपित बरी हो गए। वहीं, 1,130 से अधिक मामले अभी भी विभिन्न न्यायालयों में विचाराधीन हैं। भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में इतनी बड़ी संख्या में आरोपितों का बरी होना जांच की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर रहा है।
पिछले 10 वर्षों में दोषसिद्धि दर में सुधार
लोकायुक्त के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2015-16 के बाद आए न्यायालयीन फैसलों में दोषसिद्धि दर में सुधार देखने को मिला है। दो वर्षों को छोड़कर अधिकांश वर्षों में सजा की दर 70 प्रतिशत से अधिक रही, जिसे अभियोजन की दृष्टि से संतोषजनक माना जाता है। वर्ष 2023-24 में दोषसिद्धि दर करीब 80 प्रतिशत और 2024-25 में लगभग 71 प्रतिशत रही।
कमजोर विवेचना बनी बड़ी वजह
हाई कोर्ट के वरिष्ठ आपराधिक अधिवक्ता अजय गुप्ता का कहना है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कई बार पुलिस और जांच एजेंसियां पर्याप्त और मजबूत विवेचना नहीं कर पातीं। साक्ष्यों के संग्रहण और उन्हें अदालत में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में कमी के कारण कई मामलों में आरोपितों को संदेह का लाभ मिल जाता है, जिससे दोषसिद्धि की दर प्रभावित होती है।