इस्लामाबाद/मॉस्को: पाकिस्तान के ऊर्जा मंत्री अवैस लेघारी ने स्पुतनिक को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि पाकिस्तान के नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर में शामिल होने से रूस को अरब सागर और गर्म पानी तक पहुंच मिल सकती है जिससे वह होर्मुज स्ट्रेट से बाहर निकल सकता है। उनका ये बयान रूस को लिए बहुत बड़ा ऑफर है क्योंकि इससे रूस के लिए दक्षिण एशिया और मिडिल ईस्ट में कारोबार का एक नया रास्ता खुल जाता है। हालांकि बलूचिस्तान में अशांति से ग्वादर पोर्ट से कारोबार करना इतना आसान नहीं है फिर भी रूस के लिए ये प्रस्ताव अहम माना जा रहा है।
पुतिन का ‘गर्म वॉटर’ का ऐतिहासिक सपना
दरअसल रूस के पास दुनिया का सबसे बड़ा भूभाग है लेकिन उसकी सबसे बड़ी भौगोलिक कमजोरी उसके समंदर रहे हैं। सर्दियों के मौसम में रूस के ज्यादतर समुद्री तट और बंदरगाह बर्फ से जम जाते हैं जिससे उसका समुद्री व्यापार और नौसैनिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित होती हैं। यही वजह है कि रूसी साम्राज्य के ‘ज़ार’ शासकों के जमाने से लेकर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक मॉस्को का हमेशा से एक ही ऐतिहासिक सपना रहा है ‘वॉर्म वॉटर’ यानि गर्म पानी। यानी ऐसे ‘गर्म पानी’ वाले समंदर तक पहुंच जहां साल के 365 दिन उसके जहाज बिना किसी रुकावट के चलते रहें।
नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) में पाकिस्तान की एंट्री का मतलब
- नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) की नींव मूल रूप से साल 2000 में भारत, ईरान और रूस ने मिलकर रखी थी। इस मेगा-प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा कूटनीतिक मकसद यही था कि भारत को पाकिस्तान के रास्ते पर निर्भर हुए बिना ईरान के रास्ते यानि चाबहार पोर्ट होते हुए सीधे रूस, मध्य एशिया और यूरोप तक व्यापारिक पहुंच मिल सके।
- भारत के लिए यह प्रोजेक्ट हमेशा से पाकिस्तान को बाईपास करने का एक रणनीतिक ‘मास्टरप्लान’ रहा है। पाकिस्तान इसी प्रोजेक्ट में शामिल होना चाहता है।
- पाकिस्तान की नई रणनीति INSTC में आधिकारिक रूप से एंट्री लेकर रूस को अपनी तरफ खींचने की है। पाकिस्तान पिछले कई सालों से रूस से करीबी संबंध बनाना चाहता है ताकि भारत के खिलाफ उसके हाथ में एक हथियार आ पाए।
- पाकिस्तान की मंशा यह है कि वह अपने ग्वादर पोर्ट और चीन के सीपीईसी (CPEC) रोड नेटवर्क को इस कॉरिडोर से जोड़ दे। आसान शब्दों में समझें तो पाकिस्तान पुतिन को यह संदेश दे रहा है कि रूस को अरब सागर तक पहुंचने के लिए भारत और ईरान वाले ‘चाबहार रूट’ की जरूरत नहीं है बल्कि ग्वादर उन्हें कहीं अधिक सीधा और बेहतर विकल्प दे सकता है।
- ऐसे में अगर रूस पाकिस्तान के इस ऑफर को तवज्जो देता है तो यह मॉस्को का इस्लामाबाद की तरफ एक बड़ा कूटनीतिक झुकाव होगा। यह कदम न सिर्फ चीन-पाकिस्तान-रूस के एक नए गठजोड़ को जन्म दे सकता है बल्कि भारत के ‘चाबहार पोर्ट’ की अहमियत को कम करने की एक बहुत बड़ी और सोची-समझी साजिश भी है।
भारत के चाबहार पोर्ट के लिए यह कितनी बड़ी चुनौती?
ईरान का चाबहार पोर्ट भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा है। ये सिर्फ व्यापारिक ही नहीं बल्कि कूटनीतिक बंदरगाह भी है। इसी पोर्ट के जरिए भारत लंबे समय से पाकिस्तान को पूरी तरह बाईपास करते हुए रूस और मध्य एशिया तक अपना सुरक्षित और सीधा व्यापारिक रूट बना रहा है। लेकिन पाकिस्तान ने रूस को ग्वादर का ऑफर देकर सीधे नई दिल्ली की रणनीतिक दुखती रग पर वार करने की कोशिश की है। दिक्कत की बात ये है कि पाकिस्तान का ‘ग्वादर पोर्ट’ और ईरान का चाबहार पोर्ट भौगोलिक रूप से एक-दूसरे सिर्फ 170 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।