अमित आनंद चौधरी, नई दिल्ली: सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने यह स्वीकार किया है कि अस्पताल मरीजों से दवाओं और अन्य जरूरी सामानों के लिए बहुत अधिक MRP वसूलते हैं, जो कि एक गलत प्रथा है। सरकार ने कहा है कि वह इस समस्या को लेकर जागरूक है, इसकी जांच कर रही है और सभी संबंधित पक्षों (स्टेकहोल्डर्स) से बातचीत करके उचित कदम उठाने की योजना बना रही है।
सभी दवाओं और मेडिकल सामानों की कीमतें तय करने (कैपिंग) के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में, रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने कहा कि अस्पतालों के सामने मरीजों की मोलभाव करने की स्थिति बहुत कमजोर होती है, जिसका फायदा उठाकर कई तरह की गलत प्रथाएं अपनाई जाती हैं।
भारतीय दवा बाजार में काफी प्रतिस्पर्धा: सरकार
हलफनामे में कहा गया है कि भारतीय दवा बाजार में काफी प्रतिस्पर्धा है। यहां हर दवा श्रेणी में बड़ी संख्या में दवा कंपनियां मौजूद हैं, जिसके परिणामस्वरूप यहां दवाओं की कीमतें दुनिया में सबसे कम हैं।
आम तौर पर, जहां काफी प्रतिस्पर्धा होती है, वहां कीमतों को नियंत्रित करने की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन, स्वास्थ्य उपचार और दवा उत्पादों की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि इनमें एक तरफ मरीज होते हैं, और दूसरी तरफ रिटेल फार्मेसियां, अस्पताल की फार्मेसियां, इलाज करने वाले अस्पताल और डॉक्टर होते हैं। इनके बीच जानकारी और मोलभाव करने की क्षमता में काफी असमानता होती है।
अस्पताल कैंसर की दवाओं पर 700% तक ज्यादा कीमत वसूलते हैं
सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि अस्पताल के सामने मरीज की मोलभाव करने की स्थिति "बहुत कमजोर" होती है, और उसे दवाओं, उनके विकल्पों और उनकी कीमतों के बारे में भी बहुत कम जानकारी होती है। अस्पताल कैंसर की दवाओं पर 700% तक ज्यादा कीमत वसूलते हैं। सरकार के अनुसार, मोलभाव करने की इस असमानता और जानकारी की कमी के कारण, दवा निर्माताओं के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा होने के बावजूद, सिस्टम में कई तरह की गड़बड़ियां होती हैं।
सरकार ने अधिकतम और खुदरा कीमतों को लेकर दी जानकारी
इसलिए, इन पर नियंत्रण (रेगुलेशन) की जरूरत है। दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों का जिक्र करते हुए सरकार ने बताया कि 935 ‘शेड्यूल्ड फॉर्मूलेशन’ (दवाओं) के लिए अधिकतम कीमतें और 3,881 नई दवाओं के लिए खुदरा कीमतें तय कर दी गई हैं। सरकार ने यह हलफनामा डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की एक याचिका के जवाब में दाखिल किया है
डॉ. कुलश्रेष्ठ ने नीति आयोग की एक रिपोर्ट और तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन के 2020 के एक बयान का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च के कारण हर साल लगभग छह करोड़ परिवार गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं।