अमित आनंद चौधरी, नई दिल्ली: एनआरआई जोड़ों के बीच बच्चों की कस्टडी को लेकर होने वाले विवाद अक्सर अंतरराष्ट्रीय कानूनी लड़ाई का रूप ले लेते हैं। ऐसी स्थिति में, जब एक पक्ष को विदेशी अदालत से अपने पक्ष में आदेश मिल जाता है, जबकि दूसरा पक्ष भारतीय अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारतीय अदालतों को स्वतंत्र रूप से यह तय करना चाहिए कि बच्चे के लिए क्या बेहतर है। विदेशी अदालत के फैसले को अपने आप नहीं मान लेना चाहिए, हालांकि, उस पर उचित विचार जरूर किया जाना चाहिए।
इन मामलों का निपटारा करना आसान नहीं होता
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि ऐसे मामले बार-बार उनके सामने आ रहे हैं जिन पर विदेशी अदालतें पहले ही फैसला सुना चुकी हैं। इन मामलों का निपटारा करना आसान नहीं होता, क्योंकि इनमें बेहद भावनात्मक और संवेदनशील मुद्दे शामिल होते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे के कल्याण को “सबसे व्यापक अर्थ में समझा जाना चाहिए, न कि केवल पैसे या भौतिक सुख-सुविधाओं के नजरिए से”।
कस्टडी और संरक्षकता से जुड़े भारतीय कानून बच्चे के कल्याण पर ही आधारित
कस्टडी और संरक्षकता से जुड़े हमारे कानूनों में भी कानूनी अधिकारों के बजाय बच्चे के कल्याण पर ही सबसे ज्यादा जोर दिया गया है। ये कानून स्पष्ट करते हैं कि भले ही कोई व्यक्ति कस्टडी या संरक्षकता पाने का कानूनी हकदार हो, फिर भी उसे यह अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए, अगर इससे बच्चे का कल्याण न होता हो। इसलिए, इसमें कोई संदेह नहीं है कि किसी विदेशी अदालत के आदेश के मुकाबले बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है।
विदेशी अदालत के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई माता-पिता विदेशी अदालत के आदेश को नहीं मानते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय अदालत को उस आदेश को अपने आप लागू कर देना चाहिए। साथ ही, बच्चे के कल्याण को सबसे ऊपर रखने का यह मतलब भी नहीं है कि विदेशी अदालत के आदेश को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया जाए।