बालाघाट: मध्य प्रदेश के बालाघाट स्थित दूर-दराज के गांवों में बैगा बच्चों की मौत को लेकर यह आदिवासी इलाका चर्चा में है। एक महीने बाद भी, बीमार बच्चों के अस्पताल में भर्ती होने का सिलसिला थमा नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले कुछ महीनों में इस प्रभावित इलाके में करीब 30 बच्चों की मौत हुई है।
486 मरीजों को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़ी
वहीं, सरकार के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि सिर्फ चार गांवों में गहन स्वास्थ्य सर्वे के बाद 486 मरीजों को अस्पताल में भर्ती करने के जरूरत पड़ी। चालीस मरीजों का अभी भी इलाज चल रहा है। हालांकि इससे निपटने के लिए कई उपाय किए गए हैं लेकिन सच्चाई है कि एमपी के एक जिले में कम समय में बड़ी संख्या में बच्चों की मौत हुई।
टीकाकरण और निगरानी की जा रही है
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हजारों बच्चों और व्यस्कों की जांच, इलाज टीकाकरण और निगरानी की जा रही है। लेकिन इन जंगली गांवों के परिवारों के लिए, सरकारी कोशिशों को परखने का पैमाना बहुत सीधा है। क्या कोई बीमार बच्चा बहुत देर होने से पहले इलाज तक पहुंच जाता है।
उठ रहे हैं ये सवाल
- क्या कुपोषित बच्चों को लगातार मदद मिलती है?
- किसी दूसरे परिवार के मातम मनाने से पहले ही अगली बीमारी का पता चल जाता है?
- यह बीमारियां मौसमी बीमारियों से अलग है क्या?
स्वास्थ्य सेवाओं तक मुश्किल पहुंच
मुख्य रूप से बैगा जनजाति वाले गांवों में संक्रामक बीमारियां, कुपोषण, खरबा रहन-सहन और स्वास्थ्य सेवाओं तक मुश्किल पहुंच जैसी समस्याएं एक साथ मिल रही हैं, जिससे बच्चे खास तौर पर खतरे में हैं।
40 लोगों का चल रहा है इलाज
वहीं, कुंडेकासा, अडोरी, कोरका और बांडरी में घर-घर जाकर किए गए हालिया सर्वे से स्वास्थ्य पर पड़ रहे लगातार बोझ का पता चलता है। 10 सितंबर तक जांचे गए 6342 लोगों में से स्वास्थ्य टीमों ने 1149 मरीजों की पहचान की। जिन्हें मलेरिया, दस्त, चकत्ते के साथ बुखार और त्वचा की बीमारियांथीं। इनमें से 663 का इलाज घर पर किया गया और 486 को अस्पताल में भर्ती कराया गया। अब तक 446 लोग ठीक होकर घर जा चुके हैं, जबकि 40 का इलाज अभी चल रहा है।
पैटर्न से बढ़ रही है चिंता
वहीं, सितंबर की शुरुआत में बालाघाट जिला अस्पताल में हर दिन इलाज के लिए 20-25 बच्चे आ रहे थे, जिससे बच्चों के वार्ड को लगभग 50 बिस्तरों से बढ़ाकर 150 करना पड़ा। उस समय तक डेढ़ महीने में लगभग 400 बच्चों को भर्ती किया जा चुका था।
कुपोषण है बड़ी समस्या
हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के पोषण स्तर के सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि संकट के केंद्र में बालाघाट के बिरसा विकास खंड में है। यहां सबसे ज्यादा कुपोषण की समस्या है। अगस्त में, बिरसा में 14,259 बच्चों की जांच की गई। इनमें से 551 को गंभीर रूप से कुपोषित और 1948 के मध्यम रूप से कुपोषित माना गया। इसके अलावा 1197 बच्चे गंभीर रूप से कम वजन वाले पाए गए।
3741 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित
पूरे बालाघाट में करीब 1,21,892 बच्चों की जांच की गई है। आंकड़ों में 3741 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं। इनमें 15588 मध्य रूप कुपोषित हैं। वहीं, 8587 बच्चे कम वजन वाले पाए गए। हालांकि इससे यह साबित नहीं होता है कि बच्चों की मौत कुपोषण के कारण हुई है। लेकिन उस इलाके में बच्चों की कमजोर स्थिति को उजागर करते हैं, जहां संक्रामक बीमारियां फैल रही हैं।
इलाके में विरोध-प्रदर्शन
प्रभावित इलाकों में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन भी हुआ है। वहीं, इस मामले में प्रशासन ने कई बार स्पष्टीकरण दिया है। बालाघाट जिला प्रशासन ने अस्पतालों के अंदर फोटोग्राफी पर रोक लगाने का आदेश जारी किया, लेकिन मामला सामने आने के बाद कुछ ही घंटों बाद इसे वापस ले लिया गया। अधिकारियों ने कहा आदेश जल्दबाजी में जारी किया गया।
प्रशासन ने उठाए बड़े कदम
इसके बाद प्रशान ने बड़े कदम उठाए हैं। बीस सर्वे टीमें घर-घर जाकर स्वास्थ्य जांच कर रही हैं, जिन्हें छह पीएम-जनमन मोबाइल मेडिकल यूनिट, 18 मेडिकल ऑफिसर और चार एंबुलेंस का सहयोग मिल रहा है। अब तक 458 सेशन के जरिए लगभग 21000 बच्चों को टीका लगाया जा चुका है। 900 से ज्यादा बच्चों को विटामिन ए, ओआरएस और जिंक दिया गया है, जबकि सैकड़ों बच्चों को आयरन सिरप और एल्बेंडाजोल दिया गया है।