महिला की छाती पर ‘रेपिस्ट’ का टैटू; दिल्ली हाई कोर्ट को पता चली ये बात तो कम कर दी आरोपी की सजा

नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने 2009 में एक लड़की के साथ रेप के आरोपी शख्स की सजा को घटाकर उतनी ही कर दिया है, जितनी सजा वह पहले ही काट चुका है। कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि अब वे दोनों अपने-अपने जीवनसाथी के साथ रह रहे हैं। कोर्ट ने इस बात को भी ध्यान में रखा कि लड़की उस समय नाबालिग थी, तब लड़का 18 साला का था। तब लड़की ने लड़के का नाम अपनी छाती पर गुदवाया था और अपनी मर्जी से उसके साथ शहर से बाहर घूमने गई थी।

न्याय का मजाक उड़ाने जैसा

जस्टिस वीके यादव ने अपने आदेश में कहा कि पूरे मामले पर विचार करने के बाद कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा है कि लड़के को जेल भेजने का कोई फायदा नहीं दिखता है। अपील करने वाला और पीड़िता अब माता-पिता भी बन चुके होंगे। इसलिए पिछला रिकॉर्ड साफ होने के बाद भी आरोपी को जेल भेजना न्याय का मजाक उड़ाने जैसा होगा।


सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि जब यह साफ हो गया कि नाबालिग के साथ यौन संबंध साबित हो चुके हैं, तो उस व्यक्ति ने अपनी सजा कम करने की ही मांग की और अपना दोष स्वीकार कर लिया। हाई कोर्ट ने गौर किया कि शिकायत करने वाली महिला ने भी केस आगे न लड़ने की इच्छा जताई थी। ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं आत्म-मंथन हुआ, जहां सच पूरी तरह साफ-साफ सामने आता है। कोर्ट ने कहा कि मन में कहीं न कहीं महिला भी टैटू और मनाली की यात्रा वगैरह के बारे में जवाब और स्पष्टीकरण ढूंढ रही होगी।

दिल्ली हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला खुद को दोष से मुक्त नहीं कर सकती। अपराध में उसकी भी बराबर की हिस्सेदारी है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ एकमात्र बात लड़की की उम्र थी, जो उस समय नाबालिग थी। हालांकि, आरोपी के वकील ने सुप्रीम कोर्ट की एक सिफारिश का हवाला दिया, जिसमें ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जैसा प्रावधान लाने की बात कही गई थी, जिसे कई अन्य देशों में मान्यता दी गई है और इस्तेमाल किया जाता है। यह क्लॉज उन मामलों के लिए सुझाया गया है, जहां कम उम्र के बच्चों के बीच रोमांटिक संबंध हों और लड़का-लड़की की उम्र में बहुत कम फर्क हो। इससे पता चलता है कि उनके बीच एक तरह का रिश्ता था और नाबालिग होने के नतीजों या असर को समझे बिना ही कुछ चीजें हो गईं।

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