अमेरिकी स्टार्टअप का पारे से सोना बनाने का दावा:क्या हीरे की तरह सस्ता होगा गोल्ड; पहले भी इसे लैब में बनाने की कोशिश हो चुकी

सैन फ्रांसिस्को का एक स्टार्ट-अप है मैराथन फ्यूजन। दावा है कि उसने पारे को सोने में बदल दिया है। हालांकि, कंपनी ने यह नहीं बताया कि उसने प्रयोग में कुल कितना सोना बनाया है।

यही वजह है कि लोग पूछ रहे हैं कि क्या सच में बाजार में बेचने लायक सोना बन भी पाएगा? ‘द अटलांटिक’ के मुताबिक, यह कोई नया विचार नहीं है। पहले भी इसकी कोशिशें होती रही है।

10 आसान सवाल-जवाब में समझते हैं मैराथन फ्यूजन के दावे का पूरा सच….

सवाल 1: मैराथन फ्यूजन ने क्या दावा किया है?

जवाब: मैराथन फ्यूजन ने कहा कि उसने पारे को सोने में बदल दिया है। दावा है कि उसकी यह उपलब्धि CERN के पिछले रिकॉर्ड से 10 गुना बेहतर है। कंपनी ने कहा कि अब, हम रिकॉर्ड बिजली/ऊर्जा पैदा करने के लिए सैन फ्रांसिस्को में एक फ्यूजन रिएक्टर बना रहे हैं।

CERN दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु प्रयोगशाला है, जहां ब्रह्मांड के मूलभूत कणों और नियमों पर रिसर्च की जाती है। CERN ने भी अपने ‘लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर’ में लेड कणों की टक्कर के दौरान अनजाने में सोना बनाया था, लेकिन वह बेहद मामूली मात्रा में बना था।

सवाल 2: मैराथन फ्यूजन असल में सोना क्यों बनाना चाहता है?

जवाब: सोना बनाना मैराथन फ्यूजन का मुख्य बिजनेस नहीं है, बल्कि यह एक साइड बिजनेस जैसा है। न्यूक्लियर फ्यूजन ऊर्जा का एक बेहद साफ और असीमित स्रोत है जो भविष्य में कोयले-पेट्रोल की जगह ले सकता है, लेकिन यह तकनीक बहुत ज्यादा महंगी है।

कंपनी के को-फाउंडर एडम रुतकोव्स्की के अनुसार, फ्यूजन के दौरान बनने वाले सोने से जो करोड़ों डॉलर मिलेंगे, उससे फ्यूजन के भारी-भरकम खर्चों की भरपाई की जा सकेगी।

हर धातु या तत्व की अपनी एक पहचान होती है, जो उसके केंद्र में मौजूद प्रोटॉन की संख्या से तय होती है। पारे के केंद्र में 80 प्रोटॉन होते हैं। वहीं सोने के केंद्र में 79 प्रोटॉन होते हैं। यानी अगर पारे में से सिर्फ 1 प्रोटॉन कम कर दिया जाए, तो वह अपने आप सोना बन जाएगा।

सवाल 3: पारे से सोना बनाने की प्रक्रिया क्या है?

जवाब:

स्टेप 1- कंपनी फ्यूजन रिएक्शन के दौरान बेहद तेज रफ्तार वाले न्यूट्रॉन्स की बौछार पारे के ऊपर करती है। तेज रफ्तार न्यूट्रॉन पारे के परमाणु से टकराता है और उसके अंदर से न्यूट्रॉन को बाहर निकाल देता है। इससे पारा बदलकर ‘मरकरी-197’ नाम के एक अस्थायी और रेडियोएक्टिव रूप में आ जाता है।

स्टेप 2- मरकरी-197 का यह रूप ज्यादा देर ऐसे नहीं रह सकता। लगभग 64 घंटे के अंदर यह खुद को शांत करने के लिए एक इलेक्ट्रॉन सोख लेता है। इलेक्ट्रॉन सोखते ही पारे के अंदर का एक प्रोटॉन बदलकर न्यूट्रॉन बन जाता है। इससे प्रोटॉन की संख्या 80 से घटकर 79 रह जाती है।

सवाल 4: न्यूक्लियर फ्यूजन तकनीक क्या है और यह काम कैसे करती है?

जवाब: न्यूक्लियर फ्यूजन बिल्कुल वही प्रक्रिया है जिससे सूरज लगातार ऊर्जा पैदा करता है। इसमें दो परमाणुओं जैसे हाइड्रोजन के आइसोटोप्स को बहुत तेज तापमान और दबाव में आपस में जोड़ा जाता है। इस जुड़ाव से बहुत भारी मात्रा में साफ-सुथरी ऊर्जा पैदा होती है।

सवाल 5: क्या विज्ञान की मदद से पहले भी लैब में सोना बनाया गया है?

जवाब:

  • 1980: नोबेल पुरस्कार विजेता ग्लेन सीबोर्ग ने पार्टिकल एक्सीलेटर की मदद से बिस्मथ धातु के कुछ हजार एटम्स को सोने में बदला था। सीबोर्ग ने तब अनुमान लगाया था कि इस तकनीक से 1 औंस (28 ग्राम) सोना बनाने में 1 क्वाड्रिलियन डॉलर का खर्च आएगा।
  • CERN (2015-2018): लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर में लेड के न्यूक्लियस टकराकर लगभग 86 अरब गोल्ड न्यूक्लियस (29 पिकोग्राम यानी 1 ग्राम का 10 खरबवां हिस्सा) बनाए गए थे। हालांकि, ये एटम्स एक सेकंड के बेहद छोटे हिस्से में ही टूटकर बिखर गए थे।

सवाल 6: तकनीक सफल होती है, तो एक प्लांट में कितना सोना बन सकता है?

जवाब: मैराथन फ्यूजन के 2025 के रिसर्च पेपर के मुताबिक, 1 गीगावाट थर्मल पावर वाले कॉमर्शियल फ्यूजन प्लांट से सालाना करीब 2 टन सोना बनाया जा सकता है।

सवाल 7: इस प्रोजेक्ट के सामने सबसे बड़ी तकनीकी रुकावटें क्या हैं?

जवाब: इसके सामने 2 बड़ी रुकावटें हैं:

  • 2 टन सोना बनाने के लिए 1 गीगावाट प्लांट चाहिए। मैराथन का मौजूदा लैब रिएक्टर सिर्फ 1 किलोवाट क्षमता का है, जो 1 गीगावाट का 10 लाखवां हिस्सा है।
  • इस सोने में खतरनाक रेडियोएक्टिव आइसोटोप्स रह जाते हैं। इस सोने को बेचने या बाजार में लाने से पहले औसतन 15 साल तक सुरक्षित कोल्ड स्टोरेज में रखना पड़ेगा।

सवाल 8: इतिहास में पारस पत्थर का क्या रहस्य रहा है?

जवाब: 2,000 सालों से इंसान धातुओं को सोने में बदलने का सपना देखता आया है। ऐसा माना जाता रहा है कि एक ऐसा जादुई पत्थर है जो किसी भी धातु को छूते ही सोना बना सकता है।

1782 में ब्रिटिश केमिस्ट जेम्स प्राइस ने जादुई पाउडर से पारे को सोना बनाने का दावा किया। जब वैज्ञानिकों के सामने इसका डेमो मांगा गया, तो उन्होंने जहर पीकर जान दे दी।

वहीं, 20वीं सदी में रुडोल्फ हंटर ने सूरज के नियमों से रोज हजारों डॉलर का सोना बनाने का दावा किया, पर साबित करने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई।

सवाल 9: अन्य वैज्ञानिक और विशेषज्ञ मैराथन के इस दावे पर क्या कह रहे हैं?

जवाब:

  • प्रोफेसर डेनिस व्हाईट (MIT): उन्होंने इस आइडिया को समझदारी भरा बताया है और कहा है कि वे अपनी क्लास में कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए इसकी जांच करेंगे।
  • स्टीवन काउली (प्रिंसटन प्लाज्मा फिजिक्स लैब): उन्होंने इसे काफी अच्छा आइडिया माना है, लेकिन कहा कि वे पूरी तरह यकीन करने से पहले और डेटा देखना चाहेंगे।
  • लॉरेंस प्रिंसिपे (जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के इतिहासकार): उन्होंने मैराथन की वेबसाइट पर ‘गोल्डन एज’ जैसी बातों को देखकर कहा कि यह 16वीं और 17वीं सदी के कीमियागरों की भाषा जैसी लगती है, जो राजाओं से रिसर्च के लिए फंडिंग मांगते थे।

सवाल 10: क्या लैब-मेड गोल्ड से बाजार में सोने की कीमतें गिर जाएंगी?

जवाब: कृत्रिम हीरे के आने के बाद प्राकृतिव हीरे के दाम तेजी से गिरे हैं। पिछले 4 साल में ही प्राकृतिक हीरे के दाम 52% गिर चुके हैं। लेकिन कृत्रिम हीरे की तरह सोना बनाना सस्ता नहीं है। 2025 में दुनिया की खदानों से 3,672 टन सोना निकाला गया था। दुनिया में कुल 2,22,600 टन माइन्ड सोना पहले से मौजूद है। मैराथन के अनुमानित 2 टन सालाना उत्पादन से ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।

इलॉन मस्क की कंपनी स्टारलिंक ने कहा है कि वह भारत में हाई-स्पीड सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस शुरू करने के लिए पूरी तरह तैयार है। कंपनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक बयान शेयर करते हुए बताया कि वह पिछले 5 सालों से भारतीय रेगुलेटर्स, इंडस्ट्री और ऑपरेटर्स के साथ मिलकर काम कर रही है। 

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