किडनी शरीर के उन महत्वपूर्ण अंगों में शामिल है, जो खून से अपशिष्ट पदार्थों और अतिरिक्त तरल को फिल्टर करके बाहर निकालने में मदद करती हैं। लेकिन जब किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है, तो इसका असर धीरे-धीरे पूरे शरीर पर पड़ सकता है। अक्सर लोग मानते हैं कि किडनी की बीमारी केवल बढ़ती उम्र, खराब खानपान या डायबिटीज के कारण होती है। हालांकि, कुछ मामलों में इसके पीछे आनुवंशिक कारण यानी जेनिटिक्स फैक्टर्स भी जिम्मेदार हो सकते हैं।
यदि परिवार में माता-पिता, भाई-बहन या अन्य करीबी रिश्तेदारों को किडनी की बीमारी रही है, तो आपको अपनी किडनी की सेहत को लेकर सतर्क रहना जरूरी है।
क्या किडनी डिजीज आनुवंशिक यानी जेनिटिक्स हो सकती है?
किडनी की कुछ बीमारियां आनुवंशिक हो सकती हैं। हमारे शरीर में मौजूद जीन कई शारीरिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। जीन में कुछ विशेष बदलाव किडनी की संरचना या उसके काम करने के तरीके को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे बदलाव माता-पिता से बच्चों में पहुंच सकते हैं और कुछ परिस्थितियों में बीमारी का कारण भी बन सकते हैं।
उदाहरण के लिए, पॉलिस्टिक किडनी डिजीज (PKD), एलपोर्ट सिंड्रोम (Alport Syndrome) और फैब्री डिजीज (Fabry Disease) ऐसी स्थितियां हैं, जिनमें आनुवंशिक कारण किडनी को प्रभावित कर सकते हैं। नेशनल किडनी फाउंडेशन के अनुसार कुछ लोगों में जीन के विशेष वेरिएंट बीमारी की आशंका बढ़ाते हैं, लेकिन बीमारी होना निश्चित नहीं होता। इसलिए आनुवंशिक जोखिम और सीधे विरासत में मिलने वाली बीमारी के बीच अंतर समझना महत्वपूर्ण है।
फैमिली हिस्ट्री होने पर किडनी डिजीज का जोखिम कैसे बदल सकता है?
अमेरिकन किडनी फंड (AKF) के अनुसार, जिन लोगों के माता-पिता, भाई-बहन या दादा-दादी को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या किडनी की बीमारी रही है, उन्हें अपने जोखिम के बारे में डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। खासतौर पर यदि परिवार में कई लोगों को कम उम्र में किडनी की बीमारी हुई हो या डायलिसिस की जरूरत पड़ी हो, तो यह जानकारी डॉक्टर को बताना उपयोगी हो सकता है।
पॉलिस्टिक किडनी डिजीज जैसी अनुवांशिक कंडीशन क्या हैं?
पॉलिस्टिक किडनी डिजीज (PKD) एक आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें किडनी के अंदर तरल पदार्थ से भरी कई छोटी-बड़ी गांठें यानी सिस्ट विकसित हो जाती हैं। समय के साथ ये सिस्ट किडनी के आकार और कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ मरीजों में हाई ब्लड प्रेशर, कमर या पेट के किनारे दर्द और पेशाब में खून आने जैसी समस्याएं भी देखी जा सकती हैं। हालांकि, शुरुआती चरण में कई लोगों को स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डायबिटीज एंड डाइजेस्टिव एंड किडनी डिजीज के अनुसार, पीकेडी के दो प्रमुख प्रकार हैं, जिसमें ऑटोसोमल डोमिनेंट पीकेडी (ADPKD) और ऑटोसोमल रिसेसिव पीकेडी (ARPKD) को शामिल किया जाता है। ADPKD आमतौर पर वयस्क उम्र में सामने आती है, जबकि ARPKD के लक्षण गर्भावस्था के दौरान, जन्म के समय या बचपन में दिखाई दे सकते हैं।
एनआईएच के अनुसार एडीपीकेडी में यदि माता या पिता में बीमारी पैदा करने वाला जीन वेरिएंट मौजूद हो, तो प्रत्येक बच्चे में उसे विरासत में पाने की संभावना आमतौर पर 50% होती है। हालांकि, इससे बीमारी की गंभीरता या लक्षण शुरू होने की उम्र का सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता। डॉक्टर पारिवारिक इतिहास के आधार पर अल्ट्रासाउंड, अन्य इमेजिंग टेस्ट या जरूरत पड़ने पर Genetic Testing की सलाह दे सकते हैं।
क्या डायबिटीज और हाई बीपी की फैमिली हिस्ट्री भी किडनी जोखिम से जुड़ी है?
अमेरिका किडनी फंड के अनुसार डायबिटीज में लंबे समय तक ब्लड शुगर का स्तर बढ़ा रहने से किडनी की छोटी रक्त वाहिकाओं और फिल्टर करने वाली संरचनाओं को नुकसान पहुंच सकता है। इससे किडनी की अपशिष्ट पदार्थों को फिल्टर करने की क्षमता कम होने लगती है। इसी तरह, अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर किडनी की रक्त वाहिकाओं पर दबाव बढ़ाता है और समय के साथ उनकी कार्यक्षमता प्रभावित कर सकता है।
नेशनल किडनी फाउंडेशन के अनुसार यहां यह समझना जरूरी है कि डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर की पारिवारिक हिस्ट्री होने का मतलब सीधे तौर पर आनुवंशिक किडनी रोग होना नहीं है। इसमें आनुवंशिक प्रवृत्ति, जीवनशैली और दूसरे स्वास्थ्य कारकों की संयुक्त भूमिका हो सकती है। इसलिए परिवार में इन बीमारियों का इतिहास होने पर ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर और किडनी की सेहत की नियमित निगरानी उपयोगी रहती है।
किडनी की बीमारी परिवार में चल सकती है, लेकिन हर मामले में इसका कारण आनुवंशिक नहीं होता। कुछ बीमारियां सीधे जीन में बदलाव के कारण होती हैं, जबकि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी स्थितियां साझा आनुवंशिक और जीवनशैली संबंधी कारकों के कारण परिवारों में अधिक देखने को मिल सकती हैं। यदि परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास है, तो घबराने के बजाय डॉक्टर से अपने जोखिम पर सलाह लें। सही समय पर जांच, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर का नियंत्रण तथा जरूरत के अनुसार जेनेटिक्स काउंंसिलिंग भविष्य में किडनी संबंधी जटिलताओं के जोखिम को समझने और उचित देखभाल की योजना बनाने में मदद कर सकते हैं।